एक पिता

दूर  में क्या है, उचे से क्या दिखता है

थी बचपन की एक बड़ी इच्छा।

ऊपर उडू , पंछियो सा पंख फैलाये

उड़ता रहूँ स्वछंद होकर आसमान में

थी बचपन की एक बड़ी इच्छा।

दौड़ जाता था कभी

जहाँ आसमान धरती से मिलती थी

सोचता था कि  कभी पर्वतो के शिखर

पर जाकर आसमान को छु लूँगा।

कभी इन्द्रधनुष को पकड़ूगा

बदलो की सवारी करूँगा

प्रेशर कूकर के भाँप में

हाथ फैलाकर, कूदकर

अभ्यास करके देखना

सब याद आता है।

मासूम बचपन की पुकार सुनकर

ईश्वर ने आज उचे पर मकान दे दिया।

पर ओ दूरी नहीं दिखती

चश्मा लगाकर भी नहीं दिखती ।

आसमान धरती का मिलन

कंक्रीट के जंगल में  छुप गया।

पंछी आसमान से गायब हो गए

बचपन के साथ।

इन्द्रधनुष देखे वर्षो हो गए

उसमे रंग कितने  होते है वो भी भूल गए।

पर्वतो पर जाने का समय नहीं

जब समय  मिलता है तो ऊर्जा नहीं होती

और जब दोनों  होता तो धन नहीं।

जिंदगी कहाँ उलझ गयी है

इन समीकरणों में।

अब समझ में  आता है

बड़ा होना कितना कठिन है

आसान है माँ-बाप से लड़ना।

याद आता है वो बचपन

जब विनी को देखता हूँ।

उससे लड़ झगड़ कर

बचपन जीने की कोशिश करता हूँ।

बचपन अभी भी जिन्दा है

समीकरणों में उलझ कर

समय के साथ बदल गया है

अब समझ में आता है।

समय के साथ बदल जाना चाहिए

अब समझ में आता है।

दूर  में क्या है, उचे से क्या दिखता है

अब बच्चे का सपना है

मैं पिता बन गया हूँ ये  समझना है।


1 Response

  1. Anonymous says:

    Superb….

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